सम्मानजनक विदाई के साथ 15 लाख रुपये भी दो, निकम्मा बताकर जबरन रिटायर किए गए अधिकारी के पक्ष में SC का फैसला

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नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय व्यापार सेवा (ITS) के 1989 बैच के एक अधिकारी को निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु से करीब पांच वर्ष पहले अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने के केंद्र सरकार के फैसले को रद्द कर दिया है। अदालत ने कार्रवाई को मनमाना और दुर्भावनापूर्ण बताते हुए केंद्र सरकार को अधिकारी को कुल 15 लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। इसमें 9 लाख रुपये मानहानि और 6 लाख रुपये मुकदमे के खर्च के लिए निर्धारित किए गए हैं।

जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने मामले की सुनवाई करते हुए कहा कि जिस अधिकारी का सेवा रिकॉर्ड बेहतर रहा हो और जिसे यूपीएससी की मंजूरी के बाद योग्यता के आधार पर संयुक्त सचिव पद पर पदोन्नत किया गया हो, उसे महज दो महीने बाद बिना किसी नए प्रतिकूल साक्ष्य के ‘डेडवुड’ या अनुपयोगी घोषित करना उचित नहीं ठहराया जा सकता।

अधिकारी को 10 मई 2018 को मौलिक नियम 56(जे) के तहत अनिवार्य सेवानिवृत्ति दी गई थी। यह कार्रवाई उनकी निर्धारित सेवानिवृत्ति आयु से करीब पांच वर्ष पहले की गई थी। सरकार की समीक्षा समिति ने कुछ पुराने गोपनीय रिकॉर्ड के आधार पर उनके खिलाफ प्रतिकूल टिप्पणियां की थीं। अधिकारी ने अनिवार्य सेवानिवृत्ति के फैसले को केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) में चुनौती दी थी। वहां राहत नहीं मिलने के बाद उन्होंने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख किया, लेकिन वहां भी राहत न मिलने पर मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

पदोन्नति और अनिवार्य सेवानिवृत्ति पर उठाए सवाल

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एक ओर विभाग ने अधिकारी की योग्यता को स्वीकार करते हुए उन्हें उच्च जिम्मेदारी वाले पद पर पदोन्नत किया और दूसरी ओर महज दो महीने बाद उन्हें सेवा के लिए अनुपयुक्त बताकर अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त कर दिया। अदालत के अनुसार दोनों फैसलों के बीच स्पष्ट विरोधाभास है।

पीठ ने माना कि उपलब्ध तथ्यों के आधार पर अधिकारी को अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त करने की कार्रवाई शक्ति के मनमाने इस्तेमाल का मामला है। अदालत ने कहा कि नियम 56(जे) का इस्तेमाल किसी अधिकारी को ठोस आधार के बिना सेवा से हटाने के लिए नहीं किया जा सकता।

सभी सेवा लाभ देने का निर्देश

सुप्रीम कोर्ट ने अपील स्वीकार करते हुए निर्देश दिया कि अधिकारी को उनके सभी सेवा संबंधी लाभ इस तरह दिए जाएं, जैसे उन्हें कभी अनिवार्य रूप से सेवानिवृत्त किया ही नहीं गया था। यदि इस अवधि में उनके किसी कनिष्ठ अधिकारी को पदोन्नति मिली है, तो उन्हें भी नियमानुसार नॉटional प्रमोशन का लाभ दिया जाएगा।

अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि विदेश व्यापार महानिदेशक (DGFT) अधिकारी को कार्यालय में बुलाकर उन्हें उसी सम्मान के साथ विदाई दें, जैसी सामान्य परिस्थितियों में उनकी सेवानिवृत्ति के समय दी जानी थी। इसके साथ ही केंद्र सरकार को मानहानि और मुकदमे के खर्च के लिए कुल 15 लाख रुपये का भुगतान करने का निर्देश दिया गया है।

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